Dear Readers,
I came across these lines while I was surfing on internet...
Writer is anonymous but what he has written is fabulous...
Hope you like it...
Cheers for life :) :)
मित्रों....

शाम को थक कर टूटे झोपड़े में सो जाता है वो मज़दूर........जो शहर में ऊंची इमारतें बनाता है....

मुसीबत में अगर मदद मांगो तो सोच कर मागना क्योंकि मुसीबत थोड़ी देर की होती है और एहसान ज़िन्दगी भर का.....

मशवरा तो खूब देते हो "खुश रहा करो".....कभी-कभी वजह भी दे दिया करो...

अमीर की बेटी पार्लर में जितना दे आती है,
.......उतने में गरीब की बेटी अपने ससुराल चली जाती है....

कल एक इन्सान रोटी मांगकर ले गया और करोड़ों कि दुआयें दे गया, पता ही नहीँ चला की, ग़रीब वो था कि मैं....

दीदार की तलब हो तो नज़रें जमाये रखना ......क्यों कि 'नकाब' हो या 'नसीब' सरकता ज़रूर है''...

गठरी बाँध बैठा है अनाड़ी साथ जो ले जाना था वो कमाया ही नहीं

मैं उस किस्मत का सबसे पसंदीदा खिलौना हूँ, वो रोज़ जोड़ती है मुझे फिर से तोड़ने के लिए....

जिस घाव से खून नहीं निकलता, समझ लेना वो ज़ख्म किसी अपने ने ही दिया है..

बचपन भी कमाल का था खेलते-खेलते चाहें छत पर सोयें या ज़मीन पर, आँख बिस्तर पर ही खुलती थी...

हर नई चीज़ अच्छी होती है........ लेकिन दोस्त पुराने ही अच्छे होते हैं....

ए मुसीबत जरा सोच के आना मेरे करीब कही मेरी माँ की दुवा तेरे लिए मुसीबत ना बन जाये....

खोए हुए हम खुद हैं, और ढूंढते भगवान को हैं...

अहंकार दिखा के किसी रिश्ते को तोड़ने से अच्छा है की,..........माफ़ी मांगकर वो रिश्ता निभाया जाये....

ज़िन्दगी तेरी भी, अजब परिभाषा है..सँवर गई तो जन्नत, नहीं तो सिर्फ तमाशा है...

खुशियाँ तक़दीर में होनी चाहिये, तस्वीर में तो हर कोई मुस्कुराता है...

अहसास इश्क ए हक़ीक़ी का सब से जुदा देखा, इन्सान ढ़ूँढें मँदिर-मस्जिद...... मैंने हर रूह में ख़ुदा देखा..

ज़िंदगी भी विडियो-गेम सी हो गयी है......साला एक लैवल क्रॉस करो...... तो अगला लैवल और मुश्किल आ जाता है....

इतनी चाहत तो लाखों रुपये पाने की भी नही होती, जितनी बचपन की तस्वीर देखकर बचपन में जाने की होती है.......

हम तो पागल हैं शौक़-ए-शायरी के नाम पर ही दिल की बात कह जाते हैं और कई इन्सान गीता पर हाथ रख कर भी सच नहीं कह पाते हैं…

हमेशा छोटी-छोटी ग़ल्तियों से बचने की कोशिश किया करो , क्योंकि इन्सान पहाड़ो से नहीं.......पत्थरों से ठोकर खाता है ..
झकास रे.
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